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जौनपुर में बिना सुरक्षा व्यवस्था के अभूतपूर्व लॉक डाउन।Don News Express


बिना सुरक्षा व्यवस्था के अभूतपूर्व लॉक डाउन
फोटो,,,,,
शायद ऐसे ही रामराज की परिकल्पना होगी
जनपद की सीमाओं पर भी शांतिपूर्ण व्यवस्था
जरूरी काम वाले ही घरों से बाहर निकल रहे
सै. हसनैन कमर दीपू
जौनपुर। बचपन से राम राज की बात सुनता आया पर उसके मायने आज समझ में आए जब दो दिन से बिना पुलिस प्रशासनिक दबाव के अभूतपूर्व बन्दी देखने को मिली। पंचायत चुनाव के चलते पुलिस विभिन्न जिलों में भेजी जा रही है लिहाजा शहर के चौराहों पर भी कोई पुलिसकर्मी नजर नहीं आ रहा। फिर भी सड़कों, बाजारों, कस्बों आदि उर जगह शांति नजर आ रही है।
पिछले साल के लॉक डाउन के दौरान पुलिस प्रशासन को जहां बन्दी के लिए पसीने छूट रहे थे वहीं अबकी वीकेंड में दो दिन का लॉक डाउन देखकर यही लग रहा है कि आपदा रूपी बीमारी कोरोना ने सबको अनुशासित कर दिया है। दरअसल यह बीमारी छोटा-बड़ा, नेता, अधिकारी, पत्रकार, पुलिस सबको समान भाव से मार रही है। हर किसी को जान पर आ पड़ी है। इस बन्दी में कोई  भी सरकारों को नहीं कोस रहा है। पुलिस सामने नहीं है तो उसे कोसने का मतलब भी नहीं।
कई दुकानदारों व्यापारियों से बात करने पर पता चला कि दरअसल पुलिस ही वसूली करने के फेर में विवाद का कारण बनती है। पिछली बन्दी में कुछ दुकानों को अपने हिसाब से खुलवाकर बाज़ारों में यही संदेश दिया कि जिनके सम्पर्क होंगे वो कर्फ्यू में भी व्यापार कर सकते हैं। यही हाल जनपद की सीमाओं वाराणसी बार्डर त्रिलोचन, इलाहाबाद के मुंगराबादशाहपुर, आज़मगढ़ के शाहगंज, गौरा बादशाहपुर, गाजीपुर के पत्रही चन्दवक और भदोही के रामपुर स्थित सीमाओं पर वाहनों के आवागमन को लेकर हुई पूछताछ और वसूली ने जहां पुलिस को मालामाल किया वहीं महानगरों से आने वाले श्रमिकों को हजारों चुकाकर अपने घरों को पहुंचने में ज़लालत उठानी पड़ी थी।
इस बार शनिवार और इतवार पुलिस की नामौजूदगी ने मानो राम राज की परिकल्पना को साकार कर दिया है। बस अस्पतालों खासकर निजी अस्पलों में मनमानी वसूली कोरोना के नाम पर हो रही है। पहली भर्ती व जांच के नाम पर 25 से 27 हजार जमा कर लेते हैं और ऑक्सीजन की बारी आने पर या तो हाथ खड़े कर देते हैं अथवा सात सौ के सिलेंडर की मुंहमांगी कीमत चुकानी पड़ रही है। कोरोना की दवा नहीं है फिर भी हर दिन इलाज के नाम पर हजारों लाखों रुपये तीमारदारों को भुगतना पड़ रहा है। यही कारण है कि आमजन इन अस्पतालों को कसाईखाना की उपमा देने से गुरेज नहीं कर रहा है। प्रधानमंत्री ने चिंता जताई कि कोरोना गांवों तक न पहुंचे। उनकी चिंता वाजिब है लेकिन अब ग्रामीण इलाकों से हर रोज दो, चार, दस के मरने की खबरें रफ्तार पकड़ने लगीं हैं। यह सही है कि गांवों में लोगों के घर एक दूसरे से दूर होते हैं, आबादी भी कम और परिवारों की रिहाइश संख्या भी कम फिर भी बीते पंचायत चुनाव के दौरान डिस्टेंस की उड़ती धज्जी के बीच कोरोना ने घुसपैठ बना ली और अपना रंग अब दिखाना शुरू कर दिया है। बीते 36 घण्टे में केवल डोभी ब्लॉक के गांवों में एक दर्जन से अधिक लोगों ने दम तोड़ दिया। चिट्को गांव के रिद्धि सिंह और उनके भाई को मौत ने चार घण्टे के अंतराल पर अपने आग़ोश में ले लिया। इसी दौरान सिद्दीकपुर के पत्रकार बच्चू लाल विश्वकर्मा को निगल लिया। आमजन से यही आग्रह मीडिया, प्रशासन, पुलिस और सरकार कर रही है कि हर कोई खुद इसी तरह अनुशासित होकर लोगों की जान बचाएँ ताकि इंसानियत जिंदा रहे।

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